जानिये क्या है आपकी वास्तविक पहचान.

                                 जानिये क्या है आपकी वास्तविक पहचान

वनमाली लिखते हैं कि ब्रह्मांड में सभी जीवन की बुनियाद ब्रह्म या शुद्ध चेतना है

सनातन धर्म ने बह्मांड की चेतना को ब्रह्म का नाम दिया है. यह एक सर्वज्ञात चेतना है जिसका अस्तित्व हमेशा से रहा है और जिसका अस्तित्व हमेशा रहेगा. इसकी उत्पत्ति कभी नहीं हुई थी, इसलिए इसका अंत भी कभी नहीं होगा. अगर किसी भी चीज की उत्पत्ति एक समय में अंतरिक्ष में होती है तो अंतरिक्ष में दूसरे ही किसी पल में उसका अंत होना ही है. केवल ब्रह्म ही इस दायरे में नहीं आता है क्योंकि इसकी उत्पत्ति की अवधारणा समय और अंतरिक्ष के निर्माण से भी पहले की है. यह अस्तित्व और चेतना का शुद्ध रूप है – सत और चित. इसे हर्ष या आनंद भी कहा गया है.



ब्रह्म, ब्रह्मांड के सभी ग्रहों, तारों और पृथ्वी के सभी जीवन का आधार है. अगर ब्रह्म का अस्तित्व नहीं है तो किसी भी चीज का अस्तित्व नहीं होगा, क्योंकि यही सभी के अस्तित्व का मूल रूप है. यह चेतना का शुद्ध रूप है और यही कारण है कि हम इस संसार चेतानापूर्ण रूप से जानने में सक्षम हैं. यह हमेशा आनंद से भरा है और यही कारण है कि हमारे जीवन में क्लेश और व्याकुलता के बावजूद, हम इस संसार का आनंद उठाने में सक्षम हैं. ब्रह्म एक सर्वव्यापी चेतना है और हम इस ब्रह्मांड का हिस्सा हैं, तो जाहिर है कि यह हम सबमें व्याप्त है. तो अब प्रश्न यह उठता है: “क्या हममे कुछ ऐसा है जिसमें ब्रह्म के सारे घटक मौजूद हों?”

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हमें उन अवयकों के बारे में जानना चाहिए जो मानव जीवन को बनाते हैं. जब आप किसी से यह पूछते हैं कि वह खुद का वर्णन करे तो वह तुरंत ही अपने शरीर, अपनी लंबाई, वजन, रंग, बालों का रंग, आंखे, इन सब बातों को विस्तार से बताने लगेगा. इसका अर्थ यह है कि ज्यादातर लोग केवल अपने शरीर को अपनी पहचान मानते हैं. यह छोटी सी पूछताछ हमें यह एहसास दिलाती है कि हम इस अवधारणा से कितने दूर हैं कि यह शरीर मांस, हड्डी, त्वचा और रक्त से बना है. हम एक विचारशील प्राणी हैं. हमारे पास एक मस्तिष्क है जो इस शरीर को नियंत्रित करता है. मस्तिष्क से भी बढ़कर हमारे पास कुछ और है जिसे हम बुद्धि या बौद्धिकता कहते हैं और जो हमेशा से दिमाग को भी नियंत्रित करता आया है. अगर बौद्धिकता अच्छे से विकसित हो तो यह खुद से ही प्रश्न करना शुरू कर देगा. हिन्दू ऋषियों ने इसे एक दूसरे नजरिये से देखना शुरू कर दिया, “यह सत्य है कि मैं चेतना हूं पर उसी पल यह भी सत्य है कि मुझमें कुछ है जो चेतना का शुद्ध रूप है. मुझे उस सत्य को तलाशने दो.”



हम सब चेतना की तीन अवस्था से अवगत हैं – जागृत अवस्था, स्वप्न की अवस्था और गहरी निंद्रा की अवस्था. हमारे वास्तविकता का अनुभव इन तीन अवस्थाओं से अलग नाटकीय प्रतीत होता है. स्वप्न की अवस्था जागने की अवस्था को याद नहीं रखती और नींद की अवस्था बाकी दो अवस्थाओं को याद नहीं रख सकती है. यह अजीब बात है कि एक स्वप्नदर्शी कोई और नहीं बल्कि नींद की अवस्था में जागा हुआ इंसान होता है. वह कह सकती है, “मैंने बहुत अजीब सपना देखा” और तब “मुझे अच्छी नींद आई.” इसलिए प्रश्न यह कि वह ‘मैं’ कौन है जो चेतना में थी और स्वप्न और नींद की अवस्था की भी गवाह थी? वह ‘मैं’ जागृत अवस्था की भी गवाह है. तो कौन है यह अपरिवर्तनशील गवाह जिसने उन तीन बदलती अवस्थाओं को याद रखा है, जिससे कोई व्यक्ति गुजरता है? हिंदू धर्म में इस अपरिवर्तनशील, अपरिस्थितिक और हमेशा उपस्थित रहने वाली गवाह को आत्मा कहते हैं.


आत्मनिरीक्षण से पता चलता है कि आत्मा के पास ब्रह्म की सारी योग्यताएं हैं जैसे कि शुद्ध अस्तित्व, शुद्ध चेतना और आनंद और इसलिए, यह कुछ और नहीं बल्कि उपनिषद की घोषणा से जन्में ब्रह्म की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है. ‘तत् त्वम् असि – जिसका अर्थ है ‘वह तुम हो’ और जिसमें ‘तुम’ आत्मा के संबोधन के लिए प्रयुक्त हुआ है और ‘वह’ ब्रह्म के लिए. मानव के सारे दुखों का जन्म इसलिए हुआ है क्योंकि यह अपनी वास्तविक प्रकृति को भूल गया है और और खुद की पहचान हमारे नश्वर शरीर, मन और बुद्धि से करने लगा है.


हम अपने व्यक्तित्व को विभाजित कर रहे हैं और इसलिए हम पूरी तरह से खुश नहीं है. जब तक हम उस स्रोत का पता नहीं लगा लेते कि हम कहां से आये हैं तब तक असीम आनंद की उस सीमा को प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है. असीम आनंद, कभी भी बदलते संसार से नहीं पाया जा सकता है. सभी भौतिक सुख का अंत होना तय है या द्वैतवाद संसार की प्रकृति है. ना तो खुशी और ना ही दुख का हमेशा के लिए अंत हो सकता है. लेकिन हमें उस खुशी की उत्कंठा है जो हमेशा के लिए रहे या अंत तक रहे, बिना इस बात का एहसास किये कि संसार की इस बदलती प्रकृति के साथ यह बिल्कुल असंभव है. पर सत्य यह है कि हम परम आनंद की अवस्था की कल्पना करने में सक्षम हैं और जो यह बतलाता है कि यह एक ऐसी अवस्था है जिसके सिद्धांत से हम अज्ञान हैं. यह इसलिये है क्योंकि जिस मंच पर हम इस जीवन का नाटक कर रहे हैं, वह आत्मा है और जिसमें अस्तित्व है, चेतना है और आनंद है. इसलिए आनंद की वास्तविक अवस्था की पुनर्प्राप्ति का केवल यही एक रास्ता है ब्रह्मांड की चेतना जिसका अस्तित्व हममें आत्मा के रूप में रहता है. यह एक प्रकार का आत्ममंथन है जिसमें. हम ‘मैं’ की वास्तविकत पहचान स्वंय की आत्मा के रूप में कर लेते हैं. केवल इसका आत्मबोध कर लेने से ही असीम आनंद की प्राप्ति हो सकती है


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Akhilesh Pal

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